मैँ एक...

मैँ एक अदना मनुष्य हूँ। दुनियाँ भर के मनुष्योँ के हित मेँ सोचता हुआ, जो हो सकता है, करता हुआ। कलम और कानून मेरे हथियार हैं। न्याय और निष्पक्षता मेरा मकसद है।

मैँ हूँ

मैँ हूँ

सोमवार, 15 अगस्त 2016

मुलायम परिवार का घमासान: समर्थक परेशान

 समाजवादी खेमे में चिंता का माहौल है।सिर पर अखिलेश सरकार की नाकामियों का बोझ।उधर पार्टी के खेवनहार के परिवार का घमासान। यू पी की 2017 की लड़ाई के पहले ही खिलाफ नतीजों की आशंका से मौजूदा विधायकों  और टिकट की लाइन में लगे नेताओं में बेचैनी है। मुलायम सिंह यादव पहले भी अखिलेश सरकार के मंत्रियों की खिंचाई करते रहे हैं।मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को  भी नसीहतें मिलती रही हैं।अभी तक इसे बुजुर्ग पिता की बेटे को सीख के रूप में सुना समझा जाता रहा है। लेकिन स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर पार्टी मुख्यालय में मीडिया की मौजूदगी में मुलायम सिंह यादव के खरे खरे बोल ने जाहिर कर दिया कि उनके परिवार  में राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का हल घर की चहारदीवारी में नहीं निकल पा रहा है।उन्होंने अपने छोटे भाई शिव पाल सिंह यादव के खिलाफ साजिश पर नाराजगी जाहिर करते हुए चेतावनी दी है कि शिव पाल इस्तीफा देंगे तो पार्टी टूट जायेगी और आधे लोग उनके साथ चले जाएंगे।उधर शिव पाल सिंह के भी तेवर तीखे हैं।उन्होंने अपने इस्तीफे की धमकी के लिए पारिवारिक क्षेत्रों मैनपुरी और इटावा को चुना।मुलायम- शिवपाल के बयानों की राजनीति में दिलचस्पी लेने वालों के साथ ही गांव की चौपालों तक चर्चा है।लोग इसकी अपने अपने तरीके से व्याख्या करते हुए समाजवादी पार्टी के लिए खतरे की घंटी मान रहे हैं।
> >            पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं का संकट दोहरा है। अखिलेश सरकार में कानून व्यवस्था की हालत बदतर है।नौकरशाही बेलगाम है।सरकार  की उपलब्धियों के विज्ञापनों के रंगीन पन्नों से अखबार सजे हैं।चैनलों पर भी सरकार की कामयाबी का गान है।लेकिन जमीनी हकीकत कुछ अलग है।चुनाव की दस्तक तेज है और विपक्षी कोई मौका छोड़ नहीं रहे।उधर घर की लड़ाई विपक्षियो को और ईंधन मुहैय्या कर रही है।स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं की शिकायत है कि अपनी ही सरकार में कहीं सुनवाई नहीं।इसके लिए वे अपने विधायकों को निशाने पर ले रहे हैं।उधर विधायक निजी बातचीत में कहते हैं कि महत्वपूर्ण पदों पर तैनात अधिकारी उनकी भी अनदेखी करते हैं।उन्हें पता है कि विधायक जी को तीन चार महीने से पहले मुख्यमंत्री से मुलाकात का समय नहीं मिलना और मिल भी लिए तो कुछ करा नहीं पाएंगे।मुलायम सिंह परिवार की आपसी लड़ाई के चलते विधायकों के लिए एक और परेशानी  बढ़ी है।अभी तक वे  परिवार के सभी महत्वपूर्ण सदस्यों के यहाँ सामान्यतः हाजिरी लगा देते थे।अब नए पारिवारिक समीकरणों में बिना ठप्पा लगे सबको साधने का जतन करना है।बेशक नेताजी सर्वोच्च हैं लेकिन उन्हें नेताजी का हाल का वह बयान भी चौकन्ना करता है जिसमे उन्होंने कहा था कि उन्हें बताया गया है कि पार्टी के लोग उनसे मिलते हैं तो अखिलेश को ख़राब लगता है।वह यह याद दिलाना नहीं भूले थे कि टिकट-सिम्बल उन्ही को बांटना है। टिकट की दौड़ में जुटे लोगों को  एक ओर कहीं से भी मदद की आस रहती है। भीतर के लोग बना खेल बिगाड़ न दें इसके लिए भी पेशबंदी की जाती है।सत्ता विरोधी लहर के तेज थपेड़ों के बीच अपनों के प्रहार चुनौती को और कठिन बना रहे हैं।पार्टी टिकट की चाहत चुनाव के मौके पर स्थानीय स्तर पर धड़ेबन्दी को यों भी बढ़ा देती है।ऐसे में ऊपरी नेतृत्व का चाबुक कुनबे को एकजुट रखता है।फिलवक्त पार्टी के सर्वेसर्वा का परिवार ही आमने सामने है।फिर किसकी कौन सुने? संकट गहरा है।नतीजे पार्टी से जुड़े लोगों को डरा रहे हैं।
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> >                    राज खन्ना

रविवार, 7 अगस्त 2016

स्मृति ईरानी का घटता रुतवा:अमेठी में हुई चुनौती कमजोर


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मोदी कैबिनेट में स्मृति ईरानी का रुतवा घटने का असर अमेठी में भी नजर आ रहा है।इलाके की पांच विधानसभा सीटों के भाजपा के दावेदारों को अब स्मृति के अलावा और भी मजबूत सहारों की तलाश है।खुद स्मृति भी अमेठी के मामलों में पहले जैसी मुखर नहो हैं।केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद से कांग्रेस लगातार गांधी परिवार के निर्वाचन क्षेत्रों अमेठी,रायबरेली के साथ सौतेले व्यवहार की शिकायत करती रही है।स्मृति जो 2014 का लोकसभा चुनाव अमेठी से हारने के बाद भी,वहां काफी सक्रिय हैं,जबाब में पार्टी और सरकार की ओर से अब तक मोर्चा सम्भालती थी।जगदीशपुर के फ़ूड पार्क की योजना के रद्द होने के बाद कांग्रेस के भारी विरोध के बीच उन्होंने इस उपक्रम को अमली जामा न पहन सकने के लिए यू पी ए सरकार की शिथिलता का ब्यौरा पेश कर उसे घेर दिया था ।बन्द पड़े सम्राट साइकिल कारखाने की जमीन  राजीब गांधी ट्रस्ट को सौंपने का मामला उठाकर पलटवार में गांधी परिवार को बैकफुट पर लाने की  कोशिश की थी। लेकिन पिछले दिनों अमेठी के सूचनाप्रौद्योगिकी संस्थान बन्द किये जाने के बाद कांग्रेसी नेताओं के हमले पर  उन्होंने ख़ामोशी अख्तियार की।बेशक अब यह मंत्रालय जावेडकर के पास है और उन्होंने जबाब भी दिया लेकिन मोदी सरकार बनने के बाद से अमेठी से जुड़े हर राजनितिक हमले के मौके पर मोर्चा सम्भालने वाली स्मृति की चुप्पी ने लोगों को चौंकाया।  वह अमेठी की बदहाली का मुद्दा जोर शोर से उठा कर सवाल करती रही हैं कि गांधी परिवार ने  अपने चालीस साल के जुड़ाव में आखिर अमेठी को क्या दिया है?क्या मानव संसाधन मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग के मुकाबले महत्वहीन समझे जाने वाले कपड़ा मंत्रालय में भेजे जाने के बाद  वे अमेठी की ओर से भी उदासीन हुई हैं? असलियत में इस फेर बदल ने उनकी सरकार और पार्टी में घटती हैसियत का सन्देश दिया।इसी के साथ 2017 के यू पी विधानसभा चुनाव में उन्हें पार्टी की ओर से चेहरे की तौर पर पेश करने की चर्चाएं भी थम गईं।
>      लोकसभा चुनाव में स्मृति ने राहुल गांधी को कड़ी टक्कर दी थी।हार के बाद भी मोदी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय की जिम्मेदारी के बीच उन्होंने अमेठी में जबरदस्त सक्रियता के जरिये राहुल गांधी के लिए अपने ही गढ़ में परेशानियां काफी बढ़ा रखी हैं।इससे अमेठी में बेहद कमजोर समझी जाने वाली भाजपा को भी खासी ताकत मिली।विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के टिकट के दावेदारों की कतार लंबी हुई।उन्होंने स्मृति के अमेठी के दौरों की कामयाबी के लिए अब तक पूरी ताकत झोंकी।वे मानकर चल रहे थे कि संसदीय क्षेत्र की पांचो सीटों के टिकटों के बंटवारे में स्मृति की ही चलेगी और इसके लिए उनका भरोसा जीतना जरूरी है।लेकिन बदली स्थिति में टिकट के दावेदार स्मृति की ओर जाने से ठिठके हैं।कई को लगने लगा है कि स्मृति की पैरवी शायद लाभ की जगह नुकसान ही कर दे!अमेठी में सक्रियता की बदौलत स्मृति को यू पी में काफी चर्चा और शोहरत मिली।प्रदेश और यहाँ की राजनीति से उनका वास्ता 2014 के लोकसभा चुनाव मेंअमेठी की असफल लड़ाई तक सीमित है।लेकिन पराजय बाद अमेठी में उनकी दौड़ धूप ने उन्हें प्रदेश में पार्टी के सम्भावित चेहरे लायक राजनीतिक हैसियत दे दी।ये माना जा रहा था कि नेतृत्व  की योजना के अधीन वे अमेठी के जरिये 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में पार्टी को ताकत देने के अभियान में हैं।लम्बे अरसे से गांधी परिवार के जरिये सुर्ख़ियों की आदी हो चुकी अमेठी  भी 2019 के विकल्प को लेकर गंभीर दिखने लगी थी।इस बीच स्मृति अमेठी के लिए ऐसी योजनाओं पर काम करती रही हैं, जिसमे ज्यादा लोगों को लाभ और उनसे सीधे जुड़ाव हो सके।दिल्ली पहुँचने वाले अमेठी के लोगों की  स्मृति के यहाँ सुनवाई और जनहित से जुड़े मामलों में अन्य विभागों में खुद उनकी पैरवी से भी क्षेत्र में उनकी पकड़ मजबूत हुई है। लेकिन पहले पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से छुट्टी ।फिर कैबिनेट में एक महत्वहीन मंत्रालय में भेजने के बाद सभी कैबिनेट कमेटियों से बाहर किये जाने और इसी के साथ यू पी में उन्हें चेहरे के रूप में पेश करने की चर्चाएं थमने के बीच अब अमेठी में उनकी दिलचस्पी पर सवाल उठने लगे हैं।ये सवाल खुद उनकी दिलचस्पी को लेकर तो हो ही रहे हैं।साथ में इसको   लेकर भी हैं कि अपनी पार्टी से उपेक्षित होने के बाद अमेठी के लोग प्रतिद्वन्दी पार्टी के उत्तराधिकारी राहुल गांधी गांधी के मुकाबले उन्हें कितनी तरजीह  देना चाहेंगे?राजनीतिक घटनाक्रम दिलचस्प है।2017 के चुनाव की रणभेरी बजाने के लिए गांधी परिवार ने मोदी के निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी को चुना।सोनिया गांधी ने वहां जोरदार रोड शो किया। उधर गांधी परिवार के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में सन्नाटा है।शायद इसलिए क्योंकि लोकसभा चुनाव के वक्त से ही  अमेठी में तगड़ी चुनौती दे रही स्मृति ईरानी फ़िलहाल अपनी ही पार्टी के नेतृत्व के अविश्वास से जूझ रही हैं!

>                     --- राज खन्ना

शनिवार, 30 जुलाई 2016

दोपहर का फूल के रचनाकार ताबिश


> > झुलसती दोपहरी में ताबिश जन्मे। फिर यही दोपहर उनका मुकद्दर बन गई।पर इसमें तप कर वह कुंदन बनकर  निखरे।एक अनूठा शायर।पूरी कायनात के हर रंग-रूप,सुख-दुःख - संघर्षों -सपनों और ख्यालों को शब्दों में समेटने के लिए व्याकुल और बेचैन।जमींन का एक शायर ।एक आम इंसान । और उसी आम इंसान की ज़िन्दगी की जद्दोज़हद और कशमकश को बेहद खूबसूरती से उकेरा है उन्होंने अपने रचना संसार में।
> > मुल्क को आजादी मिली। और यही वक्त था जब वह जवान हुए।इस आजादी को लेकर सबके सपने थे।उनकी पीढ़ी  के भी ।सब सपने कब सच होते हैं? लेकिन गरीब- मजलूम की रोजी-रोटी-दवा-इलाज-तन ढंकने के कपड़े , सिर छिपाने के ठिकाने ,मिल जुल कर प्यार -मोहब्बत के साथ रहने और जुल्म-ज्यादती से निजात का तो पक्का वादा था।ये वादे टूटे।बहुतेरे आँसू बहा और नसीब मानकर चुप रहते हैं।लड़ने वाले कीमत की फ़िक्र किये बिना लड़े और लड़ रहे है।ताबिश उस जमात की अगुवाई करते हैं,जो इंसाफ- हक की लड़ाई के नतीजों की फ़िक्र नहीं करती।कलम उनका हथियार है और उससे निकले शब्द भीतर तक बींधते हैं।
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> > नहीं!सिर्फ इतना नहीं!इस दुनिया और जिंदगी में जो अच्छा है।जो सुंदर और सुहाना है।जो पास बुलाता है और जो जोड़ता है।जो आंसू पोंछता है।और जो अँधेरे की छाती  चीरकर उम्मीदों के उजाले दिखाता है।जो मायूस नहीं होने देता ।और जो मुस्कुराने की नेमत बख्शता है।जी!ताबिश के शब्द और खयालात अगर शोलों की तपिश लिए हैं तो शबनम की मानी सीपों में पहुँच मोती बनकर इस किताब की इबारतों में गुंथे हुए हैं।
> > वे उम्मीद के शायर हैं।उन्हें यकीन था कि खुदा ने आदम को जिस जन्नत से निकाल जमीन पर फेंक दिया, उस आदम के बेटे इस जमीन को एक दिन  जन्नत में तब्दील कर देंगे।ताबिश उसी जन्नत के लिए जिए।
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> >                                     राज खन्ना


दोपहर का फूल

फिल्मों में सम्वाद लेखन उनकी रोटी का जरिया था।शायरी थी उनकी जिंदगी।स्व.ताबिश सुल्तानपुरी ने फ़िल्मी दुनिया में चार दशक से ज्यादा वक्त गुजारा था।अपने वक्त की बहू बेगम और ताजमहल जैसी यादगार सौ से अधिक फिल्मों के उन्होंने डायलॉग लिखे ।हेलेन सहित कई सितारों को उर्दू सिखाई-पढाई।फ़िल्मी दुनिया की नकली चमक कभी नहीं भाई ।लेकिन घर परिवार की जरूरतें वहां रोके रखती। उनके दिल की बातें बयान करता है, उनका इकलौता काव्य संग्रह *दोपहर का फ़ूल*। 1977 में महाराष्ट्र उर्दू अकादमी की मदद से छपा था।उर्दू पाठकों ने खूब पसन्द किया था।उनके छोटे बेटे अंजुम फरोग चर्चित शायर जाहिल सुल्तानपुरी की मदद से हिंदी पाठकों के लिए उसका हिंदी एडीशन जल्दी ही प्रकाशित कर रहे हैं।दिल को छूने वाली और बेचैन करने वाली हैं, ताबिश की रचनाएँ। ऐसी ही एक गजल.......

ख़्वावों का मरमरी सा वह पैकर कहाँ गया,
नज़रें उदास-उदास हैं मन्ज़र कहाँ गया।
मस्जिद भी है वही, वही पीपल का पेड़ भी,
दोनों के दरमियाँ था मिरा घर कहाँ गया।
इक दश्त-ए बे कनार है हद्दे निगाह तक
कल तक इसी जगह था समुन्दर कहाँ गया।
थे जिसपे मेरे ख़ून के धब्बे पड़े हुए,
तेरी गली से उठके वह पत्थर कहाँ गया।
ताबिश के बाद लोग ये पूछेंगें देखना,
मोती उछाल कर वो समुन्दर कहा गया।

सोमवार, 25 जुलाई 2016

उनकी कोशिश

सुल्तानपुर के इंजीनयरिंग कालेज के एन आई के छात्र पिछले पांच वर्षों से पास पड़ोस के गरीब बच्चों को हास्टल के पीछे खुले आसमान के नीचे एक टीले पर रोज शाम पढ़ाते हैं।बरसात में खुद भीगते हैं, लेकिन तिरपाल तान बच्चों को नहीं भीगने देते।इन दिनों उनकी कक्षाओं में सौ से ऊपर बच्चे पढ़ने आ रहे हैं।ये संख्या पांच सौ के ऊपर तक पहुँच जाती है।इंजीनियरिंग छात्रों का एक बैच पढ़ कर निकलता है और अगला पतवार थाम लेता है।न प्रचार की चाहत न किसी सम्मान का इंतजार।उनकी कोशिश को सलाम।

रविवार, 24 जुलाई 2016

आ गया मैं भी

मित्रों, मैंने ब्लॉग की दुनिया के बारे में बहुत सुन रखा था। आज इसके तिलस्म में दाखिल हो गया हूँ।  कोशिश करूंगा कि जो कुछ सोचूँ , आप तक पहुंचाऊं।  सुना है यहां \बड़ी भूलभुलैया है।  कभी भटकूं तो आप में से कोई भी मित्र रास्ता दिखा सकता है , कृतज्ञ रहूँगा।  धन्यवाद।