मैँ एक...

मैँ एक अदना मनुष्य हूँ। दुनियाँ भर के मनुष्योँ के हित मेँ सोचता हुआ, जो हो सकता है, करता हुआ। कलम और कानून मेरे हथियार हैं। न्याय और निष्पक्षता मेरा मकसद है।

मैँ हूँ

मैँ हूँ

शनिवार, 30 जुलाई 2016

दोपहर का फूल के रचनाकार ताबिश


> > झुलसती दोपहरी में ताबिश जन्मे। फिर यही दोपहर उनका मुकद्दर बन गई।पर इसमें तप कर वह कुंदन बनकर  निखरे।एक अनूठा शायर।पूरी कायनात के हर रंग-रूप,सुख-दुःख - संघर्षों -सपनों और ख्यालों को शब्दों में समेटने के लिए व्याकुल और बेचैन।जमींन का एक शायर ।एक आम इंसान । और उसी आम इंसान की ज़िन्दगी की जद्दोज़हद और कशमकश को बेहद खूबसूरती से उकेरा है उन्होंने अपने रचना संसार में।
> > मुल्क को आजादी मिली। और यही वक्त था जब वह जवान हुए।इस आजादी को लेकर सबके सपने थे।उनकी पीढ़ी  के भी ।सब सपने कब सच होते हैं? लेकिन गरीब- मजलूम की रोजी-रोटी-दवा-इलाज-तन ढंकने के कपड़े , सिर छिपाने के ठिकाने ,मिल जुल कर प्यार -मोहब्बत के साथ रहने और जुल्म-ज्यादती से निजात का तो पक्का वादा था।ये वादे टूटे।बहुतेरे आँसू बहा और नसीब मानकर चुप रहते हैं।लड़ने वाले कीमत की फ़िक्र किये बिना लड़े और लड़ रहे है।ताबिश उस जमात की अगुवाई करते हैं,जो इंसाफ- हक की लड़ाई के नतीजों की फ़िक्र नहीं करती।कलम उनका हथियार है और उससे निकले शब्द भीतर तक बींधते हैं।
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> > नहीं!सिर्फ इतना नहीं!इस दुनिया और जिंदगी में जो अच्छा है।जो सुंदर और सुहाना है।जो पास बुलाता है और जो जोड़ता है।जो आंसू पोंछता है।और जो अँधेरे की छाती  चीरकर उम्मीदों के उजाले दिखाता है।जो मायूस नहीं होने देता ।और जो मुस्कुराने की नेमत बख्शता है।जी!ताबिश के शब्द और खयालात अगर शोलों की तपिश लिए हैं तो शबनम की मानी सीपों में पहुँच मोती बनकर इस किताब की इबारतों में गुंथे हुए हैं।
> > वे उम्मीद के शायर हैं।उन्हें यकीन था कि खुदा ने आदम को जिस जन्नत से निकाल जमीन पर फेंक दिया, उस आदम के बेटे इस जमीन को एक दिन  जन्नत में तब्दील कर देंगे।ताबिश उसी जन्नत के लिए जिए।
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> >                                     राज खन्ना


दोपहर का फूल

फिल्मों में सम्वाद लेखन उनकी रोटी का जरिया था।शायरी थी उनकी जिंदगी।स्व.ताबिश सुल्तानपुरी ने फ़िल्मी दुनिया में चार दशक से ज्यादा वक्त गुजारा था।अपने वक्त की बहू बेगम और ताजमहल जैसी यादगार सौ से अधिक फिल्मों के उन्होंने डायलॉग लिखे ।हेलेन सहित कई सितारों को उर्दू सिखाई-पढाई।फ़िल्मी दुनिया की नकली चमक कभी नहीं भाई ।लेकिन घर परिवार की जरूरतें वहां रोके रखती। उनके दिल की बातें बयान करता है, उनका इकलौता काव्य संग्रह *दोपहर का फ़ूल*। 1977 में महाराष्ट्र उर्दू अकादमी की मदद से छपा था।उर्दू पाठकों ने खूब पसन्द किया था।उनके छोटे बेटे अंजुम फरोग चर्चित शायर जाहिल सुल्तानपुरी की मदद से हिंदी पाठकों के लिए उसका हिंदी एडीशन जल्दी ही प्रकाशित कर रहे हैं।दिल को छूने वाली और बेचैन करने वाली हैं, ताबिश की रचनाएँ। ऐसी ही एक गजल.......

ख़्वावों का मरमरी सा वह पैकर कहाँ गया,
नज़रें उदास-उदास हैं मन्ज़र कहाँ गया।
मस्जिद भी है वही, वही पीपल का पेड़ भी,
दोनों के दरमियाँ था मिरा घर कहाँ गया।
इक दश्त-ए बे कनार है हद्दे निगाह तक
कल तक इसी जगह था समुन्दर कहाँ गया।
थे जिसपे मेरे ख़ून के धब्बे पड़े हुए,
तेरी गली से उठके वह पत्थर कहाँ गया।
ताबिश के बाद लोग ये पूछेंगें देखना,
मोती उछाल कर वो समुन्दर कहा गया।

सोमवार, 25 जुलाई 2016

उनकी कोशिश

सुल्तानपुर के इंजीनयरिंग कालेज के एन आई के छात्र पिछले पांच वर्षों से पास पड़ोस के गरीब बच्चों को हास्टल के पीछे खुले आसमान के नीचे एक टीले पर रोज शाम पढ़ाते हैं।बरसात में खुद भीगते हैं, लेकिन तिरपाल तान बच्चों को नहीं भीगने देते।इन दिनों उनकी कक्षाओं में सौ से ऊपर बच्चे पढ़ने आ रहे हैं।ये संख्या पांच सौ के ऊपर तक पहुँच जाती है।इंजीनियरिंग छात्रों का एक बैच पढ़ कर निकलता है और अगला पतवार थाम लेता है।न प्रचार की चाहत न किसी सम्मान का इंतजार।उनकी कोशिश को सलाम।

रविवार, 24 जुलाई 2016

आ गया मैं भी

मित्रों, मैंने ब्लॉग की दुनिया के बारे में बहुत सुन रखा था। आज इसके तिलस्म में दाखिल हो गया हूँ।  कोशिश करूंगा कि जो कुछ सोचूँ , आप तक पहुंचाऊं।  सुना है यहां \बड़ी भूलभुलैया है।  कभी भटकूं तो आप में से कोई भी मित्र रास्ता दिखा सकता है , कृतज्ञ रहूँगा।  धन्यवाद।