फिल्मों में सम्वाद लेखन उनकी रोटी का जरिया था।शायरी थी उनकी जिंदगी।स्व.ताबिश सुल्तानपुरी ने फ़िल्मी दुनिया में चार दशक से ज्यादा वक्त गुजारा था।अपने वक्त की बहू बेगम और ताजमहल जैसी यादगार सौ से अधिक फिल्मों के उन्होंने डायलॉग लिखे ।हेलेन सहित कई सितारों को उर्दू सिखाई-पढाई।फ़िल्मी दुनिया की नकली चमक कभी नहीं भाई ।लेकिन घर परिवार की जरूरतें वहां रोके रखती। उनके दिल की बातें बयान करता है, उनका इकलौता काव्य संग्रह *दोपहर का फ़ूल*। 1977 में महाराष्ट्र उर्दू अकादमी की मदद से छपा था।उर्दू पाठकों ने खूब पसन्द किया था।उनके छोटे बेटे अंजुम फरोग चर्चित शायर जाहिल सुल्तानपुरी की मदद से हिंदी पाठकों के लिए उसका हिंदी एडीशन जल्दी ही प्रकाशित कर रहे हैं।दिल को छूने वाली और बेचैन करने वाली हैं, ताबिश की रचनाएँ। ऐसी ही एक गजल.......
ख़्वावों का मरमरी सा वह पैकर कहाँ गया,
नज़रें उदास-उदास हैं मन्ज़र कहाँ गया।
मस्जिद भी है वही, वही पीपल का पेड़ भी,
दोनों के दरमियाँ था मिरा घर कहाँ गया।
इक दश्त-ए बे कनार है हद्दे निगाह तक
कल तक इसी जगह था समुन्दर कहाँ गया।
थे जिसपे मेरे ख़ून के धब्बे पड़े हुए,
तेरी गली से उठके वह पत्थर कहाँ गया।
ताबिश के बाद लोग ये पूछेंगें देखना,
मोती उछाल कर वो समुन्दर कहा गया।
ख़्वावों का मरमरी सा वह पैकर कहाँ गया,
नज़रें उदास-उदास हैं मन्ज़र कहाँ गया।
मस्जिद भी है वही, वही पीपल का पेड़ भी,
दोनों के दरमियाँ था मिरा घर कहाँ गया।
इक दश्त-ए बे कनार है हद्दे निगाह तक
कल तक इसी जगह था समुन्दर कहाँ गया।
थे जिसपे मेरे ख़ून के धब्बे पड़े हुए,
तेरी गली से उठके वह पत्थर कहाँ गया।
ताबिश के बाद लोग ये पूछेंगें देखना,
मोती उछाल कर वो समुन्दर कहा गया।
abhee to log motiyon ke peechhe bhag rahe hain. jab ye moti kam padenge tab samundar kee talaash hogee aur tab Tabish ko bhee dhundhenge log
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